The Heritage of India with hindi

 

The Heritage of India


A.L. Basham, the author of this lesson, was deeply interested in Indian culture, its traditions and customs. He makes us realize that the ancient Hindu civilization, assimilating the best in different cultures, continues with its cultural tradition which will never be lost.





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According to the author, Mahatma Gandhi developed the theme of social service as a religious duty, and the development still continues. The author believes that Gandhiji, though an epitome of Hindu tradition, was much influenced by Western ideas. His passionate love of the undeveloped and his antipathy to caste, were unorthodox in the extreme and owed more to European 19th century liberalism than anything Indian. This championing of women’s right is also the result of Western influence.





But there is no denying to the fact that Gandhi and his followers of the Indian National Congress have given new orientation and new life to Hindu culture, after centuries of stagnation. Indians of coming generations will not be unconvincing and self-conscious copies of Europeans, but will be men rooted in their traditions, and aware of continuity of their culture





In the past, Hindu civilization has received, adapted and digested elements of many different cultures—Indo European, Mesopotamian, Iranian, Greek, Roman, Scythian, Turkish, Persian and Arab. With each new influence it has somewhat changed. Now it is well on the way to assimilating the culture of the West.

 






                             हिन्दी अनुवाद

(1) Ram Mohan Roy ………………… successors.
राममोहन राय ने समाज-सुधार की जोरदार वकालत करके नये युग को सूत्रपात किया। विवेकानन्द ने इसे और अधिक राष्ट्रीय सुर में दोहरायो जब उन्होंने घोषित किया कि महान् माता (भारतमाता) की सेवा सर्वोच्च समाज-सेवा है। अन्य महान् भारतीयों ने भी, जिनमें मुख्य महात्मा गाँधी थे, समाज-सेवा के विषय को धार्मिक कर्तव्य के रूप में विकसित किया और यह विकास गाँधी जी के उत्तराधिकारियों के अधीन भी चल रहा है।

 







(2) Mahatma Gandhi was ………………… stagnatton.
बहुत से भारतीय भी और यूरेपियन भी महात्मा गाँधी को हिन्दी परम्परा के प्रतीक मानते थे। किन्तु यह एक झूठा निर्णय था, क्योंकि वे पाश्चात्य विचारों से बहुत प्रभावित थे। गाँधीजी अपनी प्राचीन संस्कृति के आधारभूत सिद्धान्तों में विश्वास करते थे। यद्यपि प्राचीन भारत में उनका दलितों के प्रति अत्यधिक प्यार और
जात-पाँत से अत्यधिक घृणा अनूठी थी फिर भी वे अत्यधिक रूढ़िवादी न थे और किसी भी भारतीय बात ‘ की अपेक्षा उन्नीसवीं शताब्दी के यूरोप में उदारवाद के अधिक ऋणी थे। जैसा कि हम देख चुके हैं उनका
अहिंसा में विश्वास किसी भी प्रकार हिन्दुत्व की विशेषता नहीं थी। विद्रोह में उनसे पहले उनके पूर्वज, मराठा ब्राह्मण बी० जी० तिलक तथा गाँधीजी के कट्टर अनुयायी सुभाषचन्द्र बोस इस सम्बन्ध में कहीं अधिक

कट्टर थे। गाँधीजी की शान्तिवाद की नीति के लिए ईसा का व्याख्यान ‘सर्मन ऑन दी मॉउण्ट’ तथा टॉल्सटॉय की ओर देखना चाहिए। स्त्रियों के अधिकारों के लिए उनका समर्थन भी पाश्चात्य प्रभाव का ही परिणाम था। अपने सामाजिक सन्दर्भ में वे सदा रूढ़िवादी होने की अपेक्षा आधुनिक अधिक थे। यद्यपि उनके कुछ साथी उनके सीमित समाज-सुधार के कार्यक्रम को अत्यधिक धीमा मानते थे फिर भी हिन्दू विचार के समस्त बल को जाति तथा वर्ग की प्रणाली के स्थान पर एक प्रसिद्ध तथा समानता के आधार वाले सामाजिक ढाँचे की ओर ले जाने में उन्हें सफलता मिली। उन्नीसवीं शताब्दी के कम विख्यात सुधारक के कार्य को आगे बढ़ाकर गाँधीजी ने तथा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के उनके अनुयायियों ने हिन्दू संस्कृति को जो शताब्दियों से निर्जीव पड़ी थी, नया जीवन प्रदान किया है।

 

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(3) Today there are ………………… culture of the West.
आज ऐसे भारतीय बहुत कम हैं जिनका धार्मिक विश्वास चाहे कुछ भी हो किन्तु जो अपनी प्राचीन संस्कृति को गर्व से न देखते हों और ऐसे भारतीय भी बहुत कम हैं जो उसकी दुर्बलताओं को बलिदान करने को तैयार न हों ताकि भारत उन्नति और विकास कर सके। राजनीतिक एवं आर्थिक दोनों क्षेत्रों में भारत कठिन समस्याओं का सामना कर रहा है और कोई भी व्यक्ति निश्चित रूप से उसके भविष्य के विषय में भविष्यवाणी नहीं कर सकता। किन्तु निश्चित रूप से यह भविष्यवाणी की जा सकती है कि भारत का भविष्य चाहे कुछ भी हो किन्तु भावी पीढ़ियों के भारतीय यूरोप के लोगों की बिना सोचे-समझे नकल करने वाले नहीं होंगे, किन्तु वे ऐसे व्यक्ति होंगे जो अपनी परम्पराओं में दृढ़ हों तथा अपनी संस्कृति की निरन्तरता को पहचानें। स्वतन्त्रता-प्राप्ति के केवल सात वर्ष बाद ही राष्ट्रीय आत्म-ग्लानि और सांस्कृतिक वैभव के लिए उन्माद की अति समाप्त हो रही है। हमें विश्वास है कि हिन्दू सभ्यता समन्वय के अत्यधिक आश्चर्यजनक कार्य को करने के योग्य है। भूतकाल में इसने बहुत-सी भिन्न-भिन्न संस्कृतियों के तत्त्वों को स्वीकार करके अपनाया है और अपने में मिलाया है; जैसे—इण्डो-यूरोपियन, मेसोपोटामिया, ईरान, यूनान, रोम, सीरिया, तुर्की, फारस तथा अरब की संस्कृति। प्रत्येक नये प्रभाव के साथ यह कुछ बदली है। अब यह पाश्चात्य संस्कृति को मानते हुए ठीक रास्ते पर चल रही है।










(4) Hindu civilization ………………… ways of the West.
हमें विश्वास है कि हिन्दू सभ्यता अपनी निरन्तरता को बनाए रखेगी। भगवद्गीता कर्मशील व्यक्तियों को । प्रेरणा देना बन्द नहीं करेगी और उपनिषद् विचारशील व्यक्तियों को। भारतीय जीवन की सुन्दरता और भलाई बनी रहेग्म चाहे यह पश्चिम की मेहनत बचाने वाले उपायों से कितनी ही प्रभाविते क्यों न हो। लोग महाभारत और रामायण के वीरों की कहानियों से प्यार करते रहेंगे तथा दुष्यन्त, शकुन्तला, पुरुरवा तथा उर्वशी के प्रेम को भी। वह शान्त और सज्जनता से पूर्ण आनन्द जो प्रत्येक काल में भारतीय जीवन में व्याप्त रहा और जहाँ दमन, बीमारी और गरीबी इस पर प्रभाव नहीं डाल सके हैं, वह पश्चिम के उत्तेजना से भरपूर जीवन के ढंगों के सामने निश्चित रूप से गायब नहीं होगा।







 

(5) Much that was ………………… never be lost. [2018]
प्राचीन भारतीय संस्कृति में जो बेकार था उसमें से बहुत कुछ पहले ही नष्ट हो चुका है। वैदिक युग की विनाशकारी और असभ्य सार्वजनिक बलि बहुत पहले ही भुला दी गई है फिर भी कुछ वर्गों में पशु-बलि अभी जारी है। विधवाओं को अपने पति की चिताओं पर भस्म होना बन्द हो चुका है। कानून के अनुसार लड़कियों का बचपन में विवाह नहीं हो सकता। पूरे भारतवर्ष में बसों और रेलगाड़ियों में ब्राह्मण अत्यधिक शुद्धता का विचार किये बिना नीची जाति के लोगों से मिलजुल सकते हैं और मन्दिर कानूनन सभी के लिए खुले हैं।
जाति-भेद अदृश्य होता जा रहा है। यह प्रक्रिया बहुत दिनों पहले आरम्भ हो गई थी किन्तु अब इसकी रफ्तार इतनी तेज है कि जाति को अत्यधिक आपत्तिजनक स्वरूप लगभग एक पीढ़ी में ही समाप्त हो जाएगा। पुरानी प्रणाली आज की परिस्थितियों के अनुकूल हो रही है। वास्तव में पूरे भारत का रूप बदल रहा है, किन्तु सांस्कृतिक परम्परा जारी है और यह कभी भी समाप्त नहीं होगी।

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