A Girl with a Basket LESSON at a Glance

 

 A Girl with a Basket
LESSON at a Glance

 


William C. Douglas was a judge of the Supreme Court of America. He happened to be in India and was on his way to Ranikhet from Delhi. During this short journey he got a feel of the pulse of India. He was very much impressed by the attitude of a nine-year old girl.








When he was going to Barielly by train on his way to Ranikhet, he got down at a railway station. Immediately, he was surrounded by a group of refugee children and each of them wanted to sell baskets and fans to him. He purchased some baskets and fans from them.







A beautiful nine-year old girl felt disappointed as she was not lucky enough to sell something to the author. The author felt pity for her and put a few coins in one of her baskets. The child with all pride and grace refused to accept the money and returned it to the author. Now, the author had no option but to buy her basket.

The behaviour of the girl gave the author a glimpse of the child’s spirit. She showed exemplary passion for self-respect and self-reliance. The author admits that he had fallen in love with India on this account.

 





पाठ का हिन्दी अनुवाद क

(1) Thad left …………… and reports.
दिल्ली से मैं हिमालय पर्वत की पहाड़ियों को देखने के लिए चला। मैं बरेली तक रेलगाड़ी से गया और रानीखेत तक कार से। रानीखेत अंग्रेजों की पुरानी सैनिक पहाड़ी है जो 6000 फुट लम्बी पर्वत-श्रृंखलाओं पर स्थित है और इसके सामने 120 मील लम्बा बर्फ से ढका हिमालय का भू-भाग है। रेलगाड़ी धीमी गति से जा रही थी और यह रास्ते के सभी स्टेशनों पर रुकी। गाड़ी के रुकने के प्रत्येक स्थान पर मैं अपने डिब्बे का दरवाजा खोलता था और प्लेटफॉर्म पर घूमता था। प्लेटफॉर्म लोगों की भीड़ से भरे हुए थे जिनमें सभी प्रकार के व्यक्ति सिख, मुसलमान, हिन्दु, सिपाही, व्यापारी, पुजारी, कुली, भिखारी और फेरी वाले थे। लगभग प्रत्येक व्यक्ति नंगे पैरों था और ढीले सफेद कपड़े पहने हुए था। तीन व्यक्तियों से बात करने पर मुझे एक ऐसा व्यक्ति मिला जो अंग्रेजी बोल सके। मैं सांसारिक मामलों पर प्रत्येक बड़े-से-बड़े विषय पर तथा प्रतिदिन के समाचारों पर बातचीत करता था। इस प्रकार मैं देश के लोगों की भावनाओं को जानने का प्रयत्न कर रहा था और सरकारी व्यवहार तथा खबरों के विरुद्ध मत को परखता था।




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(2) The route lay …………… drab walls.
रास्ता भारत के सर्वाधिक उपजाऊ क्षेत्रों में से एक क्षेत्र में होकर जाता था। यह ऊपरी गंगा नदी का मैदान था जो समुद्र स्तर से लगभग एक हजार फीट की ऊँचाई पर था, किन्तु गर्म था। गंगा भूरी मिट्टी से भरी हुई, बाढ़ के पानी से उमड़ी हुई थी और उसके बहाव ने हजारों एकड़ धान के खेतों को डुबो रखा था। इसके उत्तर में जंगल थे, जिनमें मनुष्य के सिर से ऊँची-ऊँची घास फैली हुई थी और कहीं-कहीं पेड़ों तथा झाड़ियों के

झुरमुट थे जिनमें चीते, हाथी, अजगर और जहरीले साँपों के घर थे और सभी स्थानों पर समतल धरती आसमान को छूती हुई दिखाई देती थी, किन्तु कहीं पवित्र बरगद के पेड़ या पाखड़ के पेड़ों की कतारें थीं, जिनका आकार मोटे मुड़े हुए तनों वाले (elm) वृक्षों के समान था। दक्षिण-पश्चिम की ओर से गर्म नम हवा बह रही थी। स्टेशनों पर कुछ नर बन्दर तथा कुछ मादा बन्दर जिनसे उनके बच्चे चिपटे हुए थे और पेड़ पर चढ़े हुए थे, पेड़ों पर भोजन की तलाश में झूल रहे थे। जिन गाँवों में से हम गुजरे उनकी दीवारें पानी तथा गोबर मिली हुई मिट्टी की बनी थीं। उनकी नुकीली छतों पर छप्पर पड़े हुए थे और घास के गट्ठर उन बाँसों से बँधे हुए थे, जो ढालदार बल्लियों के ढाँचे पर फैले हुए थे। उस दिन कद्दू की बेलों पर, जो उन पर फैली हुई थीं, फल थे और ये बेलें नीरस दीवारों पर रंग-बिरंगी धारियों में फैली हुई थीं।







(3) At one station …………… tuned the streets.
एक स्टेशन पर लोगों से बातचीत करने के मेरे कार्यक्रम में रुकावट पड़ गई। ज्योंही मैं नीचे उतरा, छोटे बच्चों का एक समूह मेरे चारों ओर इकट्ठा हो गया। ये हाथ से बुनी हुई, सरकण्डे की साधारण रूप और आकार की टोकरियाँ बेच रहे थे। उन्होंने उन टोकरियों को अपने हाथों में ऊँचा पकड़ रखा था और जोर-जोर से चिल्ला रहे थे। मैं उनके शब्दों को नहीं समझ सका, किन्तु उनके शब्द मुझे उनकी इच्छा ठीक ही व्यक्त कर रहे थे।

ये शरणार्थी बच्चे थे। जब भारत और पाकिस्तान के विभाजन का आदेश हुआ, तो लाखों लोगों को विवश होकर अपने पूर्वजों के बसाये हुए मकानों और सामान को उठाना पड़ा। नब्बे लाख लोगों ने पाकिस्तान छोड़ा
और धार्मिक भय के पागलपन से भारत आए। वहाँ से चलते समय वे बहुत गरीब व्यक्ति थे और जब उन्होंने अपनी लम्बी पैदल यात्री की तब वे और अधिक गरीब हो गए, क्योंकि उनके पास थोड़ा-सा भोजन और थोड़ा-सा सामान था। शीघ्र ही उनका भोजन समाप्त हो गया। अपनी यात्रा आरम्भ करने के कुछ ही दिनों बाद वे भूख की कमजोरी के कारण रास्ते में ही गिर गए और जहाँ गिरे वहीं पर मर गए। टोकरी बेचने वाले बच्चे इन शरणार्थियों के पुत्र-पुत्रियाँ थे। वे या उनके माता-पिता या रिश्तेदार नगरों में इकट्ठे हो गए। छोटी-छोटी दुकानें लगाई, छोटी-छोटी वस्तुएँ बनाई और उन्हीं बाजारों में जो पहले ही व्यापारियों से भरे पड़े थे, अपनी जीविका कमाने की कोशिश की। कपड़े या घास का छप्पर-सा बनाकर वे गलियों तथा सड़कों के किनारे रहे।







(4) The peasants …………… had seen,

इन शरणार्थियों में जो किसान थे, वे अपने पूरे जीवन में बहुत थोड़े में ही गुजारा करने के अभ्यस्त थे, क्योंकि एक किसान की सालाना आमदनी औसत 100 डॉलर से अधिक नहीं है। साधारण श्रमिक की औसत आय प्रतिदिन 30 सैण्टे या प्रति सप्ताह दो डॉलर से भी कम थी। दिन भर में उन्हें एक बार भोजन मिलता था जिसमें एक प्याज, एक रोटी, एक कटोरा दाल तथा मट्ठा और शायद बकरी के दूध के पनीर का टुकड़ा होता था। चाय, कॉफी, चर्बी, मिठाइयाँ या मांस बिल्कुल नहीं मिलता था। सौ डॉलर प्रति वर्ष, एक सप्ताह में दो डॉलर भी नहीं होते, फिर इतनी छोटी-सी रकम गरीब लोगों को टोकरियाँ बेचकर कमाना बहुत कठिन है। निःसन्देह यही कारण है कि ये छोटे बच्चे मेरे ऊपर टिड्डी दल के समान टूट पड़े। बच्चों ने मेरे विषय में सोचा कि अमेरिकन होने के नाते मैं अवश्य ही एक धनी ग्राहक होऊँगा।





(5) Tbought one …………… any heart.
कुछ आनों में मैंने एक छोटी टोकरी खरीदी, दूसरी कुछ अधिक पैसों में फल की टोकरी, एक रुपये में एक सुन्दर टोकरी कूड़े के लिए, एक रुपये की एक सुन्दर सिलाई टोकरी, एक-एक या दो-दो आने के कुछ पंखे। मेरे हाथ भर गए और मैंने पचास सैण्ट भी खर्च नहीं किए। बच्चे अपने सामान के विषय में शोर मचाते हुए मेरे निकट आ गए। मैं एक कैदी के समान था, पूरी तरह से घिरा हुआ और हिलने-डुलने में भी असमर्थ। सबसे परिश्रमी तथा जोर देकर अपना माल बेचने वाली नौ वर्ष की एक बालिका ठीक मेरे सामने खड़ी थी। उसके पास एक सुन्दर हैण्डल वाली टोकरी थी और वह इसके लिए डेढ़ रुपया लगभग तीस सैण्ट चाहती थी। वह ईमानदारी से अपने सामान की प्रशंसा करने वाली थी। उसकी आँखों में आँसू थे। वह इस प्रकार अपने सामान की प्रशंसा कर रही थी और ऐसे स्वर में विनती कर रही थी कि प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में दया जाग्रत हो जाएगी।


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(6) Myarms were …………… soul of India,
मेरी दोनों भुजाएँ भरी हुई थीं। दूसरी टोकरी की न आवश्यकता थी और न स्थान था। अपनी टोकरियों तथा पंखों को बाईं भुजा पर साधते हुए मैंने अपने कोट की दाईं जेब में हाथ डाला और मुट्ठीभर रेजगारी निकाली। सम्भवतः कुल 15 सैण्ट होंगे। उसे मैंने टोकरी में रख दिया जिसे उस छोटी लड़की ने प्रार्थना की दृष्टि से मेरे सामने कर रखा था। मैंने उसे यह समझाने की कोशिश की कि मैं टोकरी नहीं खरीद सकता, किन्तु उसे खरीदने के स्थान पर मैं उसे एक उपहार दे रहा हूँ। मैंने तुरन्त अनुभव किया कि मैंने उसके साथ कितना अनुचित किया है। नौ वर्ष के बच्चे ने जो फटे-पुराने कपड़े पहने हुए था और भूख से मरने के निकट था, अपनी ठोड़ी ऊपर उठाई, अपना हाथ टोकरी में डाला और एक स्त्री में जो गौरव तथा लज्जा होती है, उसके साथ मेरा धन मुझे लौटा दिया। अब मैं केवल एक ही कार्य कर सकता था। मैंने टोकरी खरीद ली। उसने अपनी आँखें पोंछी, मुस्कराई और प्लेटफॉर्म से नीचे कूद गई तथा घास-फूस की झोपड़ी की ओर चल दी जिसके सदस्यों को आज रात को कम-से-कम 30 सैण्ट तो मिलेंगे ही।






मैंने यह कहानी प्रधानमन्त्री पं० जवाहरलाल नेहरू को सुनाई। मैंने उन्हें बताया कि यही एक कारण है जिससे मैं भारत से प्यार करने लगा।

मैंने भारत के लोगों को देखा, गाँव में रहने वालों को भी और ऊँचे पद वाले व्यक्तियों को भी, उनमें गौरव, शालीनता एवं उच्च नागरिकता की भावना थी। उनमें स्वतन्त्रता के प्रति बड़ी तीव्र इच्छा थी। इस सुन्दर बच्चे ने, जो गन्दे वातावरण और गरीबी में पैदा हुआ था तथा सही भाषा और आचरण से अनभिज्ञ था, मुझे भारत के लोगों की महान् भावना की झलक दे दी।



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