A Fellow Traveler LESSON at a Glance class 12th part 1

 

A Fellow Traveler
LESSON at a Glance

 

A.G. Gardiner is one of the best essayists the world has ever had. He had the genius of describing ordinary things in an exceptionally interesting manner. The present story is an example of it.







Gardiner was travelling in a passenger train from London to a Midland Town. The passengers got down in ones and twos at the wayside stations, and in the end he was left alone in the compartment.









The sense of being alone in the compartment opened up a basketful of good things for Gardiner. Instead of feeling loneliness, he thought he could do anything he liked, he. could stand upwards on his head and nobody would see him. He could sing, dance, open or shut the windows but nobody would object it. But alas! a mosquito was disturbing him.







The mosquito fluttered, took a round in the compartment and sat on the nose of the writer. He flicked it off but it again sat on his nose after taking another round of the compartment. Then, it sat on the back of his hand and then on the newspaper he was reading. He warned the mosquito twice but in vain. Now, Gardiner decided to kill it. He adopted many tactics to get hold and kill the mosquito, but every time it escaped. At last Gardiner began to enter into the spirit of a fellow mosquito. It was no more a mere insect for him. He realised that he and the mosquito were fellow mortals in this world. But by chance they had become fellow-travellers that night.









Gardiner concludes that we take birth but we do not know from where we have come. This remains a mystery. Our life in this world is very short yet it is full of wonders. We have to struggle hard to live for this short period. Then, we go away from this world our own way.

 




पाठ का हिन्दी अनुवाद

(1) I do not ………….. even D.O.R.A.
मैं नहीं जानता कि हममें से कौन डिब्बे में पहले सवार हुआ। वास्तव में, मैं यह भी नहीं जानता था कि वह कुछ समय के लिए डिब्बे में था। यह लन्दन से मिडलैण्ड टाउन को जाने वाली अन्तिम गाड़ी थी, एक अत्यन्त धीमी गति से चलने वाली गाड़ी और ऐसा लगता था कि सम्भवत: यात्रा कभी समाप्त ही नहीं होगी। जब वह चली थी तब इसमें बहुत अधिक भीड़ न थी किन्तु ज्यों ही यह उपनगरीय स्टेशनों पर रुकती थी तब एक-एक या दो-दो यात्री नीचे उतर जाते थे, किन्तु जैसे ही हम लन्दन के बाहरी क्षेत्र से आगे बढ़े, तब डिब्बे में मैं अकेला ही था।

रात्रि के समय जो डिब्बा शोर करता हुआ झटके ले रहा हो उसमें अकेले यात्रा करना स्वतन्त्रता का आनन्द देता है। वहाँ बहुत प्रकार से स्वतन्त्रता का सुखद आभास होता है। आप अपनी पसन्द का कोई भी कार्य कर सकते हैं। आप स्वयं से जितनी जोर से चाहें बातें कर सकते हैं और कोई भी व्यक्ति आपको सुनेगा नहीं। आप जॉन (अपने काल्पनिक शत्रु) से सफलतापूर्वक लड़ सकते हैं और बिना किसी जवाबी हमले के भय के आप उसे मिट्टी में लुढ़का सकते हैं। आप अपने सिर के बल खड़े हो सकते हैं। दो कदम नाच सकते हैं। गोल्फ का अभ्यास कर सकते हैं या बिना किसी रोक-टोक के फर्श पर कंचे खेल सकते हैं या उसे बन्द कर

सकते हैं। आप दोनों खिड़की खोल सकते हैं या दोनों बन्द कर सकते हैं। आप कोई भी कोना चुन सकते हैं। और बारी-बारी से सारे कार्य कर सकते हैं। आप गद्दों पर लम्बे-लम्बे लेट सकते हैं और सारे नियमों को तोड़ सकते हैं। सम्भवतः अंग्रेजों के सुरक्षा कानूनों को भी।

 








(2) On this ………….. humiliated me.
इस रात मैंने कोई कार्य नहीं किया। वे बातें मेरे मन में भी नहीं आई। जो कुछ मैंने किया वह बहुत साधारण बात थी। जब मेरा अन्तिम साथी यात्री भी चला गया तब मैंने अपना अखबार रख दिया। अपने हाथ और पैर फैलाए, खड़ा हो गया और शान्त गर्मियों की रात्रि को खिड़की के बाहर झाँककर देखा जिसमें मैं यात्रा कर रहा था और दिन की धुंधली रोशनी को देखा जो अब भी आकाश में उत्तर की ओर थी। मैं डिब्बे के इस पार से उस पार तक गया और दूसरी खिड़की में से बाहर देखा, एक सिगरेट जलाई, बैठ गया और फिर पढ़ने लगा। उस समय मैं अपने साथी यात्री से सावधान हो गया। वह आया और मेरी नाक पर बैठ गया। वह उन कीड़े-मकोड़ों में से एक था जिन्हें हम यों ही मच्छर कह देते हैं। वह पंख वाला, तेज डंक वाला तथा निर्भीक था। मैंने उसे अपनी नाक पर से हटा दिया। उसने डिब्बे का दौरा किया। उसकी लम्बाई, चौड़ाई तथा ऊँचाई का निरीक्षण किया। प्रत्येक खिड़की को देखा। रोशनी के चारों ओर पंख फड़फड़ाए, उसने निश्चय कर लिया कि कोने में बैठे हुए मुझ जैसे बड़े प्राणी से अधिक मनोरंजक वस्तु उसके लिए और नहीं है, वह आया और उसने मेरी गर्दन पर निगाह डाली।










मैंने उसे फिर झटके से हटा दिया। वह उड़ गया, पूरे डिब्बे का दूसरा दौरा किया, वापस लौटा और धृष्टता से मेरे हाथ के पीछे बैठ गया। मैंने कहा, “यह काफी है। उदारता की भी सीमा होती है। तुम्हें दो बार चेतावनी दी गई है कि मैं एक विशेष व्यक्ति हूँ, मुझे पसन्द नहीं है कि कोई अपरिचित व्यक्ति मेरे शरीर पर गुदगुदाए। मैं अब स्वयं को एक जज मानता हूँ जो किसी कैदी को मौत का दण्ड सुनाता है। मैं तुम्हें मृत्यु दण्ड देता हूँ। यही न्याय की माँग है और अदालत का यह आदेश है। तुम्हारे विरुद्ध बहुत-से आरोप हैं। तुम आवारा हो, तुम लोक कंटक हो, तुम बिना टिकट के यात्रा कर रहे हो, तुम्हारे पास मीट कूपन भी नहीं है अर्थात् तुम्हें किसी को खून चूसने का अधिकार नहीं है। इन सभी और अनेक अन्य जुर्मों के कारण तुम अब मरने वाले हो।” मैंने अपने सीधे हाथ से बहुत तेज घातक घूसा मारा। वह बड़ी चालाकी से मेरे मुक्के से बचकर भाग गया और मैंने स्वयं को बड़ा अपमानित अनुभव किया।

 







(3) My personal ………….. I s it.
मेरा व्यक्तिगत अभिमान जाग्रत हो गया। मैं अपना पैंसा तानकर तथा अखबार लेकर आगे बढ़ा। मैं अपनी सीट पर कूदा और लैम्प के चारों ओर उसका पीछा किया। मैंने बिल्ली जैसी चतुराई की चालें अपनाईं, जब तक वह नीचे उतरा मैंने उसकी प्रतीक्षा की एवं चुपचाप आगे बढ़ा और अचानक तेजी से एवं भयंकर ढंग से उस पर वार किया।

यह भी व्यर्थ रहा। वह मेरे साथ इस प्रकार खेला जैसे कोई साँड से कुश्ती लड़ने वाला व्यक्ति क्रोधित साँड के चारों ओर चतुराई से घूमता है तथा उससे निबटता है। यह स्पष्ट हो गया था कि यह अपना मनोरंजन कर रहा था और इसी कारण उसने मेरी शान्ति को भंग किया था। वह थोड़ा खेलना चाहता था और ऐसा खेल कि इतने बड़े और भारी प्राणी के चारों ओर घूम-फिरकर जो इतना अच्छा लगता है और इतना निःसहाय और मूर्ख दिखाई देता था। मैंने अब समझने की कोशिश आरम्भ कर दी। वह अब केवल एक कीड़ा-मकोड़ा ही नहीं था। वह ऐसा बुद्धिमान व्यक्ति होता जा रहा था जो मेरी बराबरी के आधार पर ही उस डिब्बे पर अपना अधिकार रखता था। मैंने उसकी ओर स्नेह का अनुभव किया और मेरी महानता की भावना गायब होने लगी। मैं अपने आपको उस प्राणी से महान् कैसे मान सकता था जो स्पष्ट रूप से उस प्रतियोगिता में मेरा स्वामी था जिसमें हम इतनी देर से लगे थे। फिर क्यों न मैं विशाल हृदय वाला बनूं। विशाल हृदय तथा दया मनुष्य के दो सबसे अच्छे लक्षण हैं। इन्हीं दोनों गुणों के अभ्यास से मैं अपने सम्मान को पुनः प्राप्त कर सकता हूँ। इस समय मैं एक हँसी-मजाक की वस्तु था, दयावान होकर मैं मनुष्य के नैतिक सम्मान को पुन: प्राप्त कर सकता हूँ और सम्मान के साथ अपने कोने में जा सकता हूँ। अपनी सीट पर वापस आकर मैंने कहा कि मैं मृत्यु-दण्ड वापस लेता हूँ। मैं तुम्हें नहीं मार सकता, किन्तु मैं तुम्हारे मृत्यु-दण्ड को क्षमा कर सकता हूँ। मैं ऐसा कर रहा हूँ।

 









(4) I took up my ………….. round the lamp.
मैंने अखबार उठाया और वह आकर इस पर बैठ गया। मैंने कहा, ऐ मूर्ख साथी, तुमने स्वयं को मेरे हवाले कर दिया है। मैं इस सम्मानित साप्ताहिक-पत्र के दोनों पन्नों को यदि जोर से बन्द करू जैसे चाँटे की आवाज होती है तब तुम दो लेखों के बीच कुचले जाओगे और मर जाओगे, एक लेख ‘Peace Traps’ और दूसरा “The Modesty of Mr Hughes. किन्तु मैं ऐसा नहीं करूंगा। मैंने तुम्हें मृत्यु-दण्ड से क्षमा किया है और मैं तुम्हें इस बात से सन्तुष्ट कर दूंगा कि मैं जो कहता हूँ वही करता हूँ। इसके अतिरिक्त मैं तुम्हें मारना भी नहीं चाहता। तुम्हें भली प्रकार जान-पहचानकर, मैं तुमसे स्नेह करने लगा हूँ। मैं कल्पना करता हूँ कि सैंट फ्रांसिस भी तुम्हें छोटा भाई ही मानता है। मैं इतनी उदारता तथा विनम्रता नहीं दिखा सकता, किन्तु मैं तो इससे भी दूर का रिश्ता पहचानता हूँ। संयोग से हम इस गर्मियों की रात्रि में साथी यात्री बन गये हैं। मैंने तुम्हारा मनोरंजन किया और तुमने मेरा। हमारे अहसान पारस्परिक हैं और इस सत्य पर आधारित हैं कि हम दोनों ही नश्वर प्राणी हैं। हमारे जीवन का आश्चर्य और रहस्य समान है। मैं मानता हूँ कि तुम अपनी यात्रा के विषय में कुछ नहीं जानते। मुझे यह भी निश्चय नहीं है कि अपनी यात्रा के बारे में मैं अधिक जानता हूँ। वास्तव में, जब तुम यह सोचोगे तो पाओगे कि हम दोनों एक-दूसरे के ही समान हैं-केवल भूत, जो हैं और नहीं भी हैं जो रात्रि में इस प्रकार प्रकाशमान डिब्बे में आ गए हैं, थोड़ी देर तक चिराग पर फड़फड़ा रहे हैं और पुनः अँधेरे में चले जाएँगे। शायद ………

खिड़की पर से एक आवाज आई ‘Going on tonight; Sir यह एक जाने-पहचाने कुली की आवाज थी, जिसने मुझे इशारा दिया कि यही स्टेशन है, जहाँ मुझे उतरना है। मैंने उसे धन्यवाद दिया और कहा कि मैं ऊँघ रहा था। अपना टोप और छड़ी लेकर मैं गर्मियों की ठण्डी रात में बाहर आ गया। जब मैंने डिब्बे का दरवाजा बन्द किया तब मैंने अपने साथी यात्री को लैम्प के चारों ओर पंख फड़फड़ाते हुए देखा।

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